आज का प्रेरक प्रसंग : 15 जून

झगड़े का मूल

एक बार गोमल सेठ अपनी दुकान पर बैठे थे। दोपहर का समय था इसलिए कोई ग्राहक भी नहीं था तो वो थोडा सुस्ताने लगे। इतने में ही एक संत भिक्षुक भिक्षा लेने के लिए दुकान पर आ पहुचे और सेठ जी को आवाज लगाई कुछ देने के लिए…

सेठजी ने देखा कि इस समय कौन आया है ? जब उठकर देखा तो एक संत याचना कर रहा था। सेठ बड़ा ही दयालु था, वह तुरंत उठा और दान देने के लिए कटोरी चावल बोरी में से निकाला और संत के पास आकर उनको चावल दे दिया।

संत ने सेठ जी को बहुत बहुत आशीर्वाद और दुवाएं दीं। तब सेठजी ने संत से हाथ जोड़कर बड़े ही विनम्र भाव से कहा कि- हे! गुरुजन आपको मेरा प्रणाम मैं आपसे अपने मन में उठी शंका का समाधान पूछना चाहता हूँ।

संत ने कहा की जरुर पूछो। तब सेठ जी ने कहा की लोग आपस में लड़ते क्यों हैं ? संत ने सेठजी के इतना पूछते ही शांत स्वभाव और वाणी में कहा कि- सेठ मैं तुम्हारे पास भिक्षा लेने के लिए आया हूँ। तुम्हारे इस प्रकार के मूर्खता पूर्वक सवालों के जवाब देने नहीं आया हूँ।

संत के मुख से इतना सुनते ही सेठ जी को क्रोध आ गया और मन में सोचने लगे की यह कैसा घमंडी और असभ्य संत है ? ये तो बड़ा ही कृतघ्न है। एक तरफ मैंने इनको दान दिया और ये मेरे को ही इस प्रकार की बात बोल रहे हैं। इनकी इतनी हिम्मत और ये सोच कर सेठजी को बहुत ही गुस्सा आ गया और वो काफी देर तक उस संत को खरी खोटी सुनाते रहे और जब अपने मन की पूरी भड़ास निकाल चुके
तब कुछ शांत हुए।

तब संत ने बड़े ही शांत और स्थिर भाव से कहा कि- जैसे ही मैंने कुछ बोला आपको गुस्सा आ गया और आप गुस्से से भर गए और जोर जोर से बोलने और चिल्लाने लगे।


शिक्षा:-

वास्तव में केवल विवेकहीनता ही सभी झगड़े का मूल होता है। यदि सभी लोग विवेकी हो जाये तो अपने गुस्से पर काबू रख सकेंगे या हर परिस्थिति में प्रसन्न रहना सीख जायें तो दुनिया में झगड़े ही कभी न होंगे!

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